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शिवगंज (सिरोही)। राजस्थान के शांत माने जाने वाले मारवाड़-गोडवाड़ अंचल के घने जंगलों से एक बार फिर खाकी की सुस्ती और संतों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा हुआ है। सिरोही जिले के शिवगंज थाना क्षेत्र अंतर्गत ध्रुबाणा गांव से करीब तीन किलोमीटर भीतर बीहड़ों में स्थित प्राचीन कामेश्वर महादेव मंदिर परिसर में 70 वर्षीय संत त्रिवेणीगिरी महाराज का क्षत-विक्षत शव मिलना महज एक संदिग्ध मौत नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है। मंदिर की कुटिया में बिखरा पड़ा सामान, गायब नकदी व कीमती वस्तुएं और संत के शरीर पर मिले गंभीर चोटों के निशान साफ बयां कर रहे हैं कि जंगलों के एकांत में बसे इस धर्मस्थल पर लुटेरे दरिंदों ने बेखौफ होकर खूनी तांडव मचाया।

शुरुआती पुलिस तफ्तीश और मेडिकल बोर्ड के मुआयने में यह अंदेशा गहरा गया है कि संत की जान दो से तीन दिन पहले ही ले ली गई थी। 72 घंटे तक एक तपस्वी का शव खून से लथपथ हालत में कुटिया में पड़ा रहा, लेकिन किसी को भनक तक नहीं लगी। इस भयावह घटना ने न केवल संत समाज के सब्र का बांध तोड़ दिया है, बल्कि राजस्थान में संतों पर लगातार बढ़ते जानलेवा हमलों और उनकी संदेहास्पद मौतों की उस कड़वी हकीकत को फिर से जिंदा कर दिया है, जिसे पुलिस अक्सर साधारण लूट या आत्महत्या का रंग देकर फाइलों में दफन करने की कोशिश करती रही है।

धमकियों के बावजूद बेपरवाह रही पुलिस: जब जान का खतरा था तो सुरक्षा क्यों नहीं?

इस पूरे हत्याकांड में सबसे तीखा और असहज करने वाला सवाल स्थानीय पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठ रहा है। मौके पर पहुंचे साधु-संतों ने दो टूक खुलासा किया है कि संत त्रिवेणीगिरी महाराज को पिछले काफी समय से अज्ञात असामाजिक तत्वों द्वारा धमकियां दी जा रही थीं। सवाल उठता है कि जब इलाके के एक बुजुर्ग संत को खुलेआम धमकाया जा रहा था, तो स्थानीय बीट कांस्टेबल और थाने की गश्ती टीमों ने इस सुदूर वन क्षेत्र की सुध क्यों नहीं ली?

घटनास्थल का इलाका भौगोलिक रूप से पूरी तरह ‘नेटवर्क डार्क जोन’ है, जहां मोबाइल सिग्नल तक नहीं आते। अपराधियों को भली-भांति पता था कि इस बीहड़ में न कोई सीसीटीवी कैमरा है, न मोबाइल से तत्काल पुलिस को कॉल करने की गुंजाइश और न ही रात में गश्त का कोई पहरा। पूर्व विधायक और पूर्व मुख्यमंत्री सलाहकार संयम लोढ़ा ने घटनास्थल पर पहुंचकर संत समाज के आक्रोश को स्वर दिया और सीधे जिला पुलिस अधीक्षक पुष्पेंद्र सिंह से फोन पर कड़े शब्दों में जवाब-तलब किया। उन्होंने साफ कहा कि धमकियों की पूर्व जानकारी के बावजूद बरती गई लापरवाही अक्षम्य है और मामले की तह तक जाकर हत्यारों व उनके षड्यंत्रकारियों को बेनकाब करना ही होगा।

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प्रदेश में संतों की ‘रहस्यमयी मौतों’ का पुराना इतिहास और पुलिसिया लापरवाही

शिवगंज की यह रूह कंपाने वाली वारदात कोई इकलौती घटना नहीं है। राजस्थान में पिछले कुछ वर्षों के दौरान एकांत धूणियों, पहाड़ियों और जंगलों में साधना करने वाले संतों की रहस्यमयी मौत और उन पर हमलों का एक खौफनाक पैटर्न सामने आया है।

चाहे जालोर जिले के भीनमाल-सायला क्षेत्र में संतों के आश्रमों पर दबाव और संदेहास्पद परिस्थितियों में संतों के फंदे पर लटकने के मामले रहे हों, भरतपुर के कामां क्षेत्र में अवैध खनन और माफियाओं के दबाव से तंग आकर संतों के आत्मदाह व मौतों का राष्ट्रीय स्तर पर गूंजा बवाल हो, या फिर पश्चिमी राजस्थान के सुदूर आश्रमों में जमीन और चढ़ावे के लालच में संतों पर जानलेवा हमले—हर बार घटना के बाद संतों का भारी आक्रोश फूटता है, पुलिस बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन कुछ हफ्तों बाद मामले ठंडे बस्ते में चले जाते हैं।

अधिकांश मामलों में पुलिस की प्राथमिक थ्योरी अक्सर घटना को ‘आपसी रंजिश’ या ‘चोरी का विरोध’ बताकर मुख्य साजिशकर्ताओं से ध्यान भटकाने की रहती है। संतों का सीधा आरोप है कि जब तक कोई बड़ी राजनीतिक हलचल या चक्काजाम नहीं होता, तब तक दूर-दराज के आश्रमों की हिफाजत के लिए कोई ठोस एसओपी (मानक संचालन प्रक्रिया) लागू नहीं की जाती।

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लूट का मुखौटा या जमीन और वर्चस्व की गहरी साजिश?

कामेश्वर महादेव मंदिर परिसर वन विभाग की सीमा के अंतर्गत आता है। मंदिर के आसपास की भूमि, धार्मिक मान्यता और चढ़ावे को लेकर क्या कोई स्थानीय भू-माफिया या असामाजिक गिरोह नजर गड़ाए बैठा था? संत का सामान लूटा जाना क्या केवल पुलिस की दिशा भटकाने के लिए रचा गया षड्यंत्र है, या फिर यह नशेड़ियों और पेशेवर डकैतों का काम है? ये वो अनुत्तरित सवाल हैं जो शिवगंज पुलिस की कार्यकुशलता की अग्निपरीक्षा ले रहे हैं।

इधर, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक नरेंद्र कुमार के नेतृत्व में गठित जांच दल फॉरेंसिक साक्ष्य जुटाने में लगा है, लेकिन मौके पर मोबाइल टावर न होना तकनीकी सर्विलांस (सीडीआर और टॉवर डंप) के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। अब पुलिस को पारंपरिक मुखबिर तंत्र और पगडंडियों के रूट पर लगे दूर-दराज के कैमरों पर ही निर्भर रहना होगा।

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समाधि को लेकर वन विभाग की पेचदगी और भड़कता जनआक्रोश

संत त्रिवेणीगिरी की हत्या के बाद तनाव केवल आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी अंतिम समाधि को लेकर भी प्रशासनिक पेच फंस गया है। संत समाज का स्पष्ट कहना है कि महाराज ने अपना पूरा जीवन इसी कुटिया और महादेव की सेवा में समर्पित किया, लिहाजा उनकी समाधि उसी परिसर में बनेगी। चूंकि यह इलाका वन विभाग के अधीन आता है, इसलिए तकनीकी और विधिक अड़चनों को सुलझाने के लिए प्रशासनिक अधिकारी और वन अमला मौके पर साधु-संतों से वार्ता में जुटा है।

ध्रुबाणा के घने जंगलों से उठा यह धुआं अब पूरे जिले में फैल चुका है। साधु-संतों ने चेतावनी दी है कि यदि 48 घंटे के भीतर हत्यारों की गिरफ्तारी और लूट के पूरे मामले का पर्दाफाश नहीं हुआ, तो सिरोही जिले भर के संत लामबंद होकर सड़कों पर उतरेंगे और जिला मुख्यालय का घेराव करेंगे। अब दारोमदार सिरोही पुलिस पर है कि वह इसे महज एक ‘अज्ञात ब्लाइंड मर्डर’ मानकर फाइलों में दबाती है या फिर बीहड़ों में साधुओं की जिंदगी से खिलवाड़ करने वाले दरिंदों को सलाखों के पीछे भेजकर खाकी का खोया इकबाल बहाल करती है।

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By Sumerpur News

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